हिमाचल के फार्मा इंडस्ट्री में बनाई जा रही दवाई से 60 से अधिक देशों का मर्ज दूर हो रहा है। इस दवाई का सेवन अमरीका, यूरोप, रूस, जर्मनी, यूएई, श्रीलंका और बेल्जियम जैसे देशों में बीमारियां दूर करने के लिए किया जा रहा है। भारत में प्रयोग हो रही दवाइयों में से हर तीसरी दवाई हिमाचल में बनाई जा रही है। दवाइयों के निर्यात का यह कारोबार 13 हजार करोड़ से ज्यादा है और इन दवाइयों को बनाने के लिए कच्चे माले पर सालाना 35 हजार करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं। हिमाचल प्रदेश भारत का प्रमुख फार्मास्युटिकल हब है।
यह देश की लगभग 30 से 35 प्रतिशत दवाओं का निर्माण करता है। सरकारी और आर्थिक सर्वेक्षणों के अनुसार हिमाचल प्रदेश में मुख्य रूप से जेनेरिक, ब्रांडेड फॉर्मूलेशन, टैबलेट, कैप्सूल, सिरप, इंजेक्शन, एंटीबायोटिक, हृदय संबंधी, मधुमेह, एलर्जी, दर्द निवारक आदि दवाएं बनाई जाती हैं। यहां पर कुछ आयुर्वेदिक एवं होम्योपैथिक दवाइयां बनाने की इकाइयां भी हैं। बद्दी में नई एनएबीएल मान्यता प्राप्त लैब शुरू हो की गई है। इस लैब में सालाना 6000 सैंपल टेस्ट किए जा सकते हैं। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन के मासिक ड्रग अलर्ट और हिमाचल विधानसभा में स्वास्थ्य मंत्री डा. धनीराम शांडिल के जवाबों के अनुसार, राज्य से निकलने वाली दवाओं के सैकड़ों सैंपल नियमित रूप से नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी घोषित हो रहे हैं।
हिमाचल में दवाइयां बनाने में लगी 651 यूनिट
हिमाचल प्रदेश के फार्मा इंडस्ट्री में करीब 651 यूनिट दवाइयां बना रहे हैं। यहां पर दवाइयों का कारोबार ही 30 हजार करोड़ से ज्यादा का है
हिमाचली दवाई 60 देशों का मर्ज कर रही दूर; 13 हजार करोड़ का निर्यात, इन देशों में हो रहा इस्तेमाल
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हिमाचली दवाई 60 देशों का मर्ज कर रही दूर; 13 हजार करोड़ का निर्यात, इन देशों में हो रहा इस्तेमाल
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